रिश्तेदार छूटने लगे तासीर बदल गई।
अपनापन अब भी मगर मैं सम्भल गई।।
हर तरह की बात केवल अजीज करते।
खुशियो की तासीर में चाहत ढल गई।।
तलाशती है आँखें अब भी किलकारियाँ।
जो बेहिसाब गूँजती थी हवा में घुल गई।।
शादीशुदा जिन्दगी की बात और होती।
अल्हड़पन की सादगी अन्दर पिघल गई।।
लहजे की बेबाकी थमने लगी 'उपदेश'।
बिना किसी शर्त के किस्मत बदल गई।।
- उपदेश कुमार कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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