आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तमन्ना उभरती बिखरती

                
                                                         
                            तम्मना उभरती बिखरती अन्दर कुछ कहती।
                                                                 
                            
साँस चढ़ती उतरती उनके साथ रहना चाहती।।

मृत्यु आने से पहले कुछ देर के लिए ही सही।
जीवन को फिर से बाहों में भर लेना चाहती।।

गोद में सिर रखकर आँखें बन्द होने से पहले।
खुली आँखों से तुम्हारी आँखें देखना चाहती।।

कितना सुहाना वह वक्त होगा कब्र के पहले।
हसीन यादो को फिर तरोताजा करना चाहती।।

मोहब्बत समझेगा वही जिसने की हो 'उपदेश'।
तुम्हारे जुल्मों की वादियों में डूब जाना चाहती।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
42 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर