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सीलन आँखों तक न आ जाए

                
                                                         
                            मन की सीलन आँखों तक न आ जाए।
                                                                 
                            
रोको मन-बढ़ बादल कहीं न छा जाए।।

ख्याल खुमारी में दिन फिसले हाथों से।
मान-मनौवल में ठहरी हवा न छा जाए।।

निपट जवानी में भी बचपन पलता है।
खट्टे-मीठे सपनों में दर्द कहीं न छा जाए।।

लगा दिसंबर मीठी ठंडी का हुआ आगमन।
कम्बल में 'उपदेश' बेकरारी न छा जाए।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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3 घंटे पहले

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