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प्रेम की पराकाष्ठा

                
                                                         
                            कोई तो होगा गुज़रे वक्त का मारा।
                                                                 
                            
परिसीमा बनाती होगी उसका सहारा।।

दूर तलक खींच दी गई कई रेखाएँ।
निष्कासित जीवन हो गया बेसहारा।।

वक्त खिसकता जा रहा तन्हाई में।
इंतजार परिधि में आने का तुम्हारा।।

पीड़ा की दीवारों को लाँघ कर के।
तुम तक पहुँचने को बेचैन मन हमारा।।

प्रेम की पराकाष्ठा कौन समझ सका।
मार्ग प्रशस्त होगा 'उपदेश' मेरा तुम्हारा।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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23 मिनट पहले

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