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जहाँ जाना है, चले जाइए।

                
                                                         
                            ज्यादातर लोग उलझे रहते बेफिजूल की संगत में,
                                                                 
                            

किसने क्या कहा,
किसने हमारा साथ नहीं दिया,
किसने हमें समझा नहीं,
किस रिश्ते में क्या कमी रह गई।

इसलिए अब जो समय बचा,
उसे शिकायतों में नहीं,
अपनी पसंद की ज़िंदगी बनाने में लगाइए।
जिन लोगों के साथ मन हल्का होता है,
उनके पास बैठिए।

जहाँ मन घुटता है,
वहाँ से थोड़ा हट जाइए।
जो कहना है, कह दीजिए।
जहाँ जाना है, चले जाइए।

और सबसे ज़रूरी 'उपदेश'..
अपने लिए जीने को हमेशा किसी सही समय का इंतज़ार मत कीजिए।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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