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गरीबो की हाय

                
                                                         
                            शिखर पर पहुँच कर खुशी जाती रही।
                                                                 
                            
चरित्र ने बौना बनाया इज़्ज़त जाती रही।।

ऊँचाई पर टिके रहना किस्मत में न था।
बुराईयों के बीच फंसकर चैन जाती रही।।

अंहकार ईर्ष्या क्रोध और छल- कपट से।
बनाई विश्व गुरू की पदवी भी जाती रही।।

उनका मन बुराईयों से ऊपर उठ ना पाया।
जग को जीतने की अभिलाषा जाती रही।।

दंद-फंद से दौलत जोड़ी हवा में घूमे फिरे।
लम्बे-लम्बे 'उपदेश' मन की बात जाती रही।।

अपने भीतर झाँक लेते अगर शिक्षित होते।
भँवर में फंसकर गरीबो की हाय खाती रही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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17 मिनट पहले

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