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आँखें खोलकर देखती कोई नही।

                
                                                         
                            मेरी जवानी उस रात जाने कैसी।
                                                                 
                            
शांत दिखती नदी की तरह वैसी।।

बरसात का मौसम चुपचाप उमड़ा।
तुम्हारा नाम लेने पर बेचैनी कैसी।।

उस उलझन से पालकों पर बोझ।
एक मीठी सी सिहरन उभरी वैसी।।

आँखें खोलकर देखती कोई नही।
चाँदनी बिखरी दिखी दूधिया जैसी।।

याद पल भर दूर जाती नही 'उपदेश'।
याद आने की प्रक्रिया आज भी वैसी।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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13 मिनट पहले

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