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मसला आज भी मंझधार में तैरा रहा जैसे।।

                
                                                         
                            तेरे बारे में सोचते चाय ठंडी हो गई जैसे।
                                                                 
                            
मसला आज भी मंझधार में तैरा रहा जैसे।।

किरदार मेरा हद की पाबंदियों में उलझा।
तुमसे दूर रहकर ज़माने को बता रहा जैसे।।

रातों को स्याही से बचाना मुश्किल होगा।
यादों को रबर घिस घिस के सुला रहा जैसे।।

सच बोलूंगा तो प्यार की बदनामी का डर।
हर हाल में ज़माने को झूठ सिखा रहा जैसे।।

सब को वज़ह बता भी नही सकता 'उपदेश'।
प्रेम की बात में ही मसला उठाता रहा जैसे।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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24 मिनट पहले

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