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बेहद पसन्द

                
                                                         
                            तुम बेहद पसन्द आ गई मुस्कुराहट से।
                                                                 
                            
डर बता ना सकी दरवाजे की आहट से।।

दरारों से झाँकना चुपके चुपके ताकना।
कोई सद-भाव उभरा नही सजावट से।।

थोड़ी हिम्मत दिखाती तो राज खुल जाते।
फिर काम नही चलता उनकी बनावट से।।

एक लाठी से सब को हांकना भारी पड़ा।
हलक में जान फँस गई चिड़चिड़ाहट से।।

भाग्य की रेखाएँ बनतीं बिगड़ती रह गई।
'उपदेश' कुछ ना कर पाए खिलाफ़त से।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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3 घंटे पहले

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