आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बचपन की सोच

                
                                                         
                            बचपन की सोच में एक आस हुआ करती थी।
                                                                 
                            
अच्छा कर गुजरने की एक चाह हुआ करती थी।।

उसी चाह को सीने में रख जवानी का मोड़ आया।
प्रतियोगिता में जीतने की हसरत हुआ करती थी।।

सफ़ल होने की आपाधापी में खुद को झोंक दिया।
असफल होने पर अन्दर असंतुष्टि हुआ करती थी।।

अब अपने से कह रही जो मिला वो भी कम नही।
मगर फिर भी 'उपदेश' मिश्र प्यास हुआ करती थी।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
49 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर