छेड़ना नही चाहती तुम्हारे अहम के अंगारों को
भूचाल हिला सकता है बनाये सुख के द्वारों को
हर बार मेरी शीतलता को इम्तिहान देना पड़ता
अन्यथा बर्बाद होते देखा है नदी के किनारों को
बदले ताप और दबाव से समीकरण बदल जाते
रासायनिक भौतिक क्रिया नष्ट करती बहारों को
हम अनभिज्ञ नही और अनाड़ी भी नही 'उपदेश'
सहलेंगे भूकंप के झटके बनाये रखेंगे सहारों को
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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