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जीवन -वृक्ष

                
                                                         
                            पचास वर्ष पार कर आज,
                                                                 
                            
जब जीवन के इस पड़ाव पर खड़ा हूँ,
अपने अस्तित्व को निहारता हूँ,
तो लगता है—
मैं अब नन्हा पौधा नहीं,
एक विशाल वृक्ष बन चुका हूँ।

मेरी शाखाएँ दूर-दूर तक फैली हैं,
कुछ पर फल हैं, कुछ मुरझाई हैं,
कुछ फल पककर गिर जाते हैं,
कुछ औरों के हिस्से आते हैं।
कुछ शाखाएँ अब कमजोर हैं,
पर नई कोंपलें भी फूट रही हैं—
मानो जीवन कहता हो,
अभी कुछ आशाएँ शेष रही हैं।

कभी याद आता है वह नन्हा पौधा,
जो आकाश छूने के सपने देखता था,
जिसके मन में इच्छाएँ कम थीं,
और जीवन सरल हुआ करता था।
आज अपेक्षाओं का बोझ बहुत है,
पर हर उम्मीद कहाँ पूरी कर पाया हूँ?
कुछ दायित्व अधूरे रह गए,
कुछ सपने पूरे न कर पाया हूँ।

परिवार की आशाएँ, अपनों के सपने,
समाज की उम्मीदें और रिश्तों के बंधन—
सबको साथ लेकर चलने की चाह में,
कभी स्वयं से ही दूर चला आया हूँ।
फिर भी मन में एक विश्वास है,
कि जो कर सका, वह कम नहीं;
और जो रह गया, उसकी कसक ही
आगे बढ़ने का संकल्प सही।

आज जब समय के इस पड़ाव पर
अपने जन्म के उस बीज को याद करता हूँ,
जिससे मेरे अस्तित्व ने आकार लिया,
तो मन सहज ही कह उठता है—
जीवन ठहर जाने का नाम नहीं,
यह निरंतर चलते रहने की कहानी है।

आँधियाँ आएँ या तूफ़ान उठें,
हवाएँ चाहे जिस ओर बहें,
वृक्ष को अपनी जड़ों से जुड़े रहना है,
उसे अपना कर्तव्य निभाते रहना है।
अपने लक्ष्य, अपने स्वप्न और अपनों को
हर कठिनाई में सँभाले रखना है—
यही उसका जीवन-सार है,
यही उसके अस्तित्व का आधार है।

जब तक तने में शक्ति शेष है,
जब तक जड़ों में नमी बाकी है,
तब तक छाया बाँटते रहना है,
अपने हिस्से की धूप सहकर भी
दूसरों के लिए फलते रहना है।

और जिस दिन जीवन की साँझ
मेरी हरियाली को समेट लेगी,
जब मेरी शाखाएँ मौन होंगी,
जब मेरी यात्रा विराम लेगी,
तब भी मेरी एक चाह शेष रहेगी—
मेरा अस्तित्व मिट्टी में मिलकर भी
किसी नए जीवन को जन्म दे।

काश! मैं फिर किसी समय
एक नन्हे बीज के रूप में पनपूँ,
धरती की गोद में पलकर
एक नया जीवन-वृक्ष बनूँ।
जिसकी छाया में थके मुसाफ़िर ठहरें,
जिसके फल से भूखों का पेट भरे,
जिसकी डालियों पर सपने पलें
और जिसकी हरियाली से
किसी निराश मन में आशा जगे।

अब समझा हूँ जीवन का अर्थ—
केवल ऊँचा उठना जीवन नहीं,
दूसरों को सहारा देना भी है।
केवल अपने लिए जीना जीवन नहीं,
अपने जाने के बाद भी
किसी के हृदय में जीवित रहना है।

वृक्ष भले ही मिट्टी में मिल जाए,
उसका बीज फिर भी हार नहीं मानता।
एक जीवन का अंत हो सकता है,
पर जीवन का संदेश कभी समाप्त नहीं होता।

यही मेरी अंतिम अभिलाषा है,
यही मेरे जीवन की आशा है—
आज वृक्ष हूँ, कल मिट्टी बन जाऊँ,
और फिर किसी नए वसंत में
एक बीज बनकर लौट आऊँ।

क्योंकि जीवन केवल जीने का नाम नहीं,
अपने बाद भी जीवन बोने का नाम है।जीवन-वृक्ष

एक आत्ममंथन

रचनाकार: उमेश मिश्रा

पचास वर्ष पार कर आज,

जब जीवन के इस पड़ाव पर खड़ा हूँ,

अपने अस्तित्व को निहारता हूँ,

तो लगता है—

मैं अब नन्हा पौधा नहीं,

एक विशाल वृक्ष बन चुका हूँ।

मेरी शाखाएँ दूर-दूर तक फैली हैं,

कुछ पर फल हैं, कुछ मुरझाई हैं,

कुछ फल पककर गिर जाते हैं,

कुछ औरों के हिस्से आते हैं।

कुछ शाखाएँ अब कमजोर हैं,

पर नई कोंपलें भी फूट रही हैं—

मानो जीवन कहता हो,

अभी कुछ आशाएँ शेष रही हैं।

कभी याद आता है वह नन्हा पौधा,

जो आकाश छूने के सपने देखता था,

जिसके मन में इच्छाएँ कम थीं,

और जीवन सरल हुआ करता था।

आज अपेक्षाओं का बोझ बहुत है,

पर हर उम्मीद कहाँ पूरी कर पाया हूँ?

कुछ दायित्व अधूरे रह गए,

कुछ सपने पूरे न कर पाया हूँ।

परिवार की आशाएँ, अपनों के सपने,

समाज की उम्मीदें और रिश्तों के बंधन—

सबको साथ लेकर चलने की चाह में,

कभी स्वयं से ही दूर चला आया हूँ।

फिर भी मन में एक विश्वास है,

कि जो कर सका, वह कम नहीं;

और जो रह गया, उसकी कसक ही

आगे बढ़ने का संकल्प सही।

आज जब समय के इस पड़ाव पर

अपने जन्म के उस बीज को याद करता हूँ,

जिससे मेरे अस्तित्व ने आकार लिया,

तो मन सहज ही कह उठता है—

जीवन ठहर जाने का नाम नहीं,

यह निरंतर चलते रहने की कहानी है।

आँधियाँ आएँ या तूफ़ान उठें,

हवाएँ चाहे जिस ओर बहें,

वृक्ष को अपनी जड़ों से जुड़े रहना है,

उसे अपना कर्तव्य निभाते रहना है।

अपने लक्ष्य, अपने स्वप्न और अपनों को

हर कठिनाई में सँभाले रखना है—

यही उसका जीवन-सार है,

यही उसके अस्तित्व का आधार है।

जब तक तने में शक्ति शेष है,

जब तक जड़ों में नमी बाकी है,

तब तक छाया बाँटते रहना है,

अपने हिस्से की धूप सहकर भी

दूसरों के लिए फलते रहना है।

और जिस दिन जीवन की साँझ

मेरी हरियाली को समेट लेगी,

जब मेरी शाखाएँ मौन होंगी,

जब मेरी यात्रा विराम लेगी,

तब भी मेरी एक चाह शेष रहेगी—

मेरा अस्तित्व मिट्टी में मिलकर भी

किसी नए जीवन को जन्म दे।

काश! मैं फिर किसी समय

एक नन्हे बीज के रूप में पनपूँ,

धरती की गोद में पलकर

एक नया जीवन-वृक्ष बनूँ।

जिसकी छाया में थके मुसाफ़िर ठहरें,

जिसके फल से भूखों का पेट भरे,

जिसकी डालियों पर सपने पलें

और जिसकी हरियाली से

किसी निराश मन में आशा जगे।

अब समझा हूँ जीवन का अर्थ—

केवल ऊँचा उठना जीवन नहीं,

दूसरों को सहारा देना भी है।

केवल अपने लिए जीना जीवन नहीं,

अपने जाने के बाद भी

किसी के हृदय में जीवित रहना है।

वृक्ष भले ही मिट्टी में मिल जाए,

उसका बीज फिर भी हार नहीं मानता।

एक जीवन का अंत हो सकता है,

पर जीवन का संदेश कभी समाप्त नहीं होता।

यही मेरी अंतिम अभिलाषा है,

यही मेरे जीवन की आशा है—

आज वृक्ष हूँ, कल मिट्टी बन जाऊँ,

और फिर किसी नए वसंत में

एक बीज बनकर लौट आऊँ।

क्योंकि जीवन केवल जीने का नाम नहीं,

अपने बाद भी जीवन बोने का नाम है।
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35 minutes ago

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