आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मन पे छाया है तेरा ही नशा।

                
                                                         
                            दिल में आशा जगी, वंदना हो गई,
                                                                 
                            
तेरा अस्तित्व ही मेरा चमन हो गया।
तेरे चरणों में जब से झुका ये हृदय,
मेरा जीवन तुझे ही समर्पित हो गया।

स्वप्न देखा तो कदम आगे बढ़ने लगे,
नैन तकते रहे, तेरे दर्शन जब हुए।

मन की पीड़ा भी पूजा बनने लगी,
मेरा अश्रु भी तुझको अर्पण हुआ।

दिल में आशाजगी, वंदना हो गई,
तेरा अस्तित्व ही मेरा चमन हो गया।

जिसे अपना समझकर सँजोए बैठा था मैं
वही तेरे चरणों में सब अर्पण हुआ।
हार में भी तेरी इच्छा दिखने लगी,
दर्द भी मेरा अब तुझको अर्पण हुआ।

कुछ न माँगा, न कोई शिकायत रही,
तेरे नाम का ही अब मुझको आसरा।
अहंम का दीपक भी बुझने लगा,
मेरी आत्मा तुझमें ही रमने लगी।

दिल में आशा जगी, वंदना हो गई,
तेरा अस्तित्व ही मेरा चमन हो गया।

राम तेरे नाम का ऐसा सहारा मिला,
जीवन को जैसे नया किनारा मिला।
तेरी महिमा चहुँओर दिखने लगी,
मन पे छाया है तेरा ही नशा।

न कोई इच्छा रही, न कोई कामना,
तेरे चरणों को अर्पित मेरा सारा जहां।
तू ही आरंभ है, तू ही मेरा विराम,
तेरे नाम से ही रोशन मेरा जहां।
 - उमेश मिश्रा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर