नज़र में सबकी जो क़ीमत मेरी ज़बान की है
ये आबरू मेरे कुनबे की खानदान की है,
अभी तो पर भी मेरे ठीक से नहीं निकले,
मगर निगाह मेरे सर पे आसमान की है।
ज़हन पे उतरी है इलहाम बनके जो मेरे,
वो बात चाँद सितारों के दरमियान की है
इसीलिए तो तुझे दावत ए ख़िताब न दी,
मैं जानता था जो क़ीमत तेरे बयान की है
महक़ थी वो किसी दरवेश के पसीने की,
उमैर जिसको समझता था इत्रदान की
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