गरीबों के हक की छत छीनकर तुम
कंबल बाँटकर राजनीति कर रहे हो
बड़े लाजवाब हो, होने वाले मंत्री जी
इज्जत बेचकर इज्जत कमा रहे हो
गरीबों को गरीब बनाने का हुनर है तुममें
अब उनके सामने रहनुमा बन रहे हो
कभी घर जाकर आईने से पूछना
मूर्ख हो या लोगों को मूर्ख बना रहे हो
महलों में बैठकर कभी-कभी गंध तो आती होगी
नाक खराब है या सेंट से महका रहे हो
कभी जाया करो उन वादों वाली गलियों में
कीचड़ से जूते और लोगों से मुँह छुपा रहे हो
कल तक हाथ-पैर पकड़ रहे थे मंत्री जी
कुर्सी मिलते ही हाथ पैर पकड़वा रहे हो
याद रखना पैसों पे वोट देने वाले है ये पब्लिक
अगली बार के लिए ,पैसा जमा कर रहे हो
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