अपने हृदय के सब राज़ अब खोल दो
प्रेम करते हो मुझसे तो हाँ बोल दो
तुम हो रंगरेज़, कोरी चुनर सी हूँ मैं
जो तुम्हें भाए, मुझमें वो रंग घोल दो
मैं जो युग-युग से तेरी ही बनकर रही
इस प्रतीक्षा का मुझको कोई मोल दो
मैं न तोड़ूँगी उल्फ़त की इस डोर को
चाहे कोई भी सौग़ात अनमोल दो
मेरे हक़ में तराजू भी झुक जाएगा
तेरी मेरी वफ़ा तुम अगर तोल दो
— त्रिशिका धरा
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