मधुर मुस्कान, अधरों पर
चमक, सजीली नेत्रों पर।
शशि-सा, शीतल मुख
बिखरी लाली नवोदित अरुण।
केश काले, घुंघराले
सौंदर्य-श्रृंगार अभिराम।
त्यों सदृश, गहरी कूप
ज्यों ठहरी, काया पलक विराम।
पूर्ण-संपूर्ण
किंतु, अपुष्पित कली
जिसे खिलना है।
खिलकर खिलखिलाकर
हँसी के फव्वारों से,
बुझा जायें यह दहकन।
प्रेमपूरित हो यह जीवन
स्वप्न झूलते मेरे नैना।।१।।
मगर झूलन केवल नैना
युगल बाहें वीरान,
हृदय-वेदन अब तक शेष
तन स्पर्श अंजान।
अनजान।
अंगुलियांँ गेसूँ सहलाहट से,
उष्ण श़्वासें टकराहट से,
तन आलिंगन कसमसाहट से,
अनजान।
नाक लड़ की अड़चन से,
माथ अधर की छुअन से,
हृदय शीतल स्पंदन से,
अनजान।
शीश प्रियतम के दामन से,
देह-देह के तापन से,
मन प्रेम अग्नि मापन से,
गुंथी नहीं, बातें कभी भी
न देह की गुत्थम-गुत्थी,
मन उलझन से, घिरा अभी भी
प्रेम गुत्थी जैसी सुलझी नहीं।।२।।
क्या यही प्रेम सात्विक?
निश्छल, निष्कपट, वास्तविक
या यौवन की
सहज रीति
देह प्रीति?
सुंदरता स्तुति?
अथवा-सर्वथा
हृदय-मस्तिष्क के मध्य झूलता
तन-मन,
संस्कार-प्रतिकार
सही, किंतु अभी नहीं
के कुचक्र में घिरा
प्रकृति-प्रदत्त,
सहज-साध्य,
यौवन उपहार
"प्रेम अवसाद"।।३।।
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