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मंज़िल की तलाश में चल रही हूँ,

                
                                                         
                            ठीक हूँ मैं…
                                                                 
                            

अपने माता-पिता को छोड़कर आई हूँ,
फिर भी कहती हूँ — ठीक हूँ मैं।

जहाँ प्यार की एक बूँद भी न मिली,
वहीं उम्र गुज़ार दी,
कहती हूँ — ठीक हूँ मैं।

बार-बार अपना कहकर,
अपनों ने ही बेगाना कर दिया,
फिर भी मुस्कुराकर कहती हूँ — ठीक हूँ मैं।

बेटी से बहू तो बन गई,
पर बहू बनकर भी अपनापन न पाया,
प्यार की आस लगाए बैठी रही,
फिर भी कहती हूँ — ठीक हूँ मैं।

चाहा जिसे उम्र भर टूटकर,
उसने अपने अहंकार को रखा मुझसे ऊपर,
दिल के टुकड़े समेटकर कहती हूँ — ठीक हूँ मैं।

जब अपनों ने ही बेइज़्ज़त कर कहा,
“अपने घर चली जाओ,”
तो आँसू छिपाकर कह दिया — ठीक हूँ मैं।

उम्मीद थी जिससे वक़्त, प्यार और अपनेपन की,
उसी ने पराया होने का एहसास करा दिया,
फिर भी दिल को समझाकर कहती हूँ — ठीक हूँ मैं।

आज भी तलाश है अपने उस घर की,
जहाँ सुकून हो, प्यार हो, अपनापन हो,
जहाँ मुझे साबित न करना पड़े कि मैं भी अपनी हूँ।

मंज़िल की तलाश में चल रही हूँ,
खुद को समेटकर, हर दर्द सहकर,
न जाने कब मिलेगा अपना- घर कोई जहाँ…
तब तक दुनिया से यही कहूँगी —
हाँ, ठीक हूँ मैं…
बस, अब पहले जैसी नहीं हूँ मैं।
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एक घंटा पहले

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