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पुलवामा हमला

                
                                                         
                            न जाने उन्होंने क्या महसूस किया होगा।
                                                                 
                            
जब वो दर्दनाक हादसा वहाँ हुआ होगा।
सो रहे थे बो बेखोफ होकर।

कुछ जाग रहे थे अपनों की यादों मे।
और कुछ याद कर रहे थे अपनों को सोकर।
फिर जब एक दम से बम फटा होगा।
न जाने कितने हिस्सो मे उनका जिसम
बट्टा होगा।
माँ दिल पर पत्थर रख कर भेजा था।
अपने लाल को सरहद पर।

उसका दिल तो तितत-बितर हुआ होगा।
जब उसकी जान का टुकड़ा बेजान हुआ होगा।
आयी होगी उन साहिदों की मिटटी जब उनके
घर तो कोई फुट फुट कर रोया होगा।
मिटटी को देख कर माँ बिलख रही होगी।
बाप अपने आंसू छिपा रहा होगा।

बीवी को तो सुध बुध ही न रही होगी।
और उसका छोटा सा बच्चा मासूमियत से।
पापा उठो न उठो न ।
कह कर बुला रहा होगा।

जिस मंजर को सोच कर हमारी रूह कांप जाती है।
उस रूह कापा देने वाले मंजर मे वो रहे होंगे।
उनकी परिवारों के हर सदस्य ने उनकी यादों
के दर्द सहे होंगे ।

हमे सत सत नमन है।
उनकी सहादत का
हमरा दिल ताउम्र कर्जदार रहेगा।
उनकी हिफाजत का।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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