देर हो गई भले ही अब,
पर एक कोशिश भर का वक़्त है मेरे पास,
कागज़ की उन कश्तियों को पीछे छोड़,
इंतज़ार करता वो ख्वाइशों से भरा जहाज़,
किस्मत उसपर बैठने वालों की,
कुछ ने खुद लिखी, कुछ को मिली विरासत में,
फुर्सत के पल सवारता मैं सोचता रहा,
की वो नाम, शौहरत और पैसा,
कभी ना कभी होंगे मेरे पास,
पर सोचने से क्या होता है भला?
लोग कहते हैं यह है पहला पड़ाव,
जब हो आपको इस बात का आभास,
की ज़रूरी क्या है और क्या नहीं,
तब लगती है हिम्मत,और काम आता है अभ्यास,
पर तकदीर को कौन हरा पाया है आज तक,
जो मैं बन बैठु खुद सरताज?
फिर मैंने सोचा की सोच सोच के ही रह गया तो?
यह जहाज़ पानी के साथ ही बह गया तो?
ख़्वाबों पे टंगी उम्मीदों का साहस, धरा का धरा रह गया तो?
तो उठ चल, बढ़ा कदम,
की वो दिन है आज,
देर से ही सही पर समझ तो आया,
कि एक कोशिश भर का वक़्त है मेरे पास।
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