हम अपनी रूह से, इक बार जो,मिल पाते तो अच्छा !
किसी भी रूप में, हम आदमी ,बन जाते तो अच्छा !
हमें अच्छा दिखाना खुद को तो, अच्छा बहुत लगता,
बिचारे दिल में भी अच्छाईयां, भर लाते तो अच्छा !
बड़े आराम से बिछड़ा मेरा घर, कुछ नहीं बोला,
हाँ, बेशक गाँव का ही था, पर ,आते जाते तो अच्छा !
भला हर मंच से देते नसीहत, लड़कियों को क्यों?
तुम अपने घर में ही , बेटे को , समझाते तो अच्छा !
- तनु थदानी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X