अग़ज़ल
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नहीं हुआ है जनम हमारा,यहां हमारी मर्जी से !
नहीं रहा चल कुछ भी तो, यहां हमारी मर्जी से !
मालिक हैं मर्जी के हम, बोल तो देते हैं जबकि,
होगी नहीं हमारी मृत्यु , यहां हमारी मर्जी से !
क्यूं आयें अनजान सफ़र पे, अनजानी सी धरती पे,
सांसें तक भी ले न पाते, यहां हमारी मर्जी से !
कितने चेहरों से मिलना है,खोना पाना है किसको ,
नहीं है मिलता दर्द खुशी भी,यहां हमारी मर्जी से !
मर्जी तेरी जितने चाहे, ख्वाब देख ले फर्जी में,
इक भी पूरा हो पाता है, कहां हमारी मर्जी से !
एक जगह ही मर्जी चलती, बाबू जी का घर है वो,
सभी जरुरतें पूरी होती, जहां हमारी मर्जी से !
-तनु थदानी
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