दिल जो टूटा आईने की तरह,
हर टुकड़े में तुम नज़र आने लगे।
मैंने चाहा था भूल जाऊँ तुम्हें,
मगर तुम साँसों में उतर जाने लगे।
मैंने जब भी समेटना चाहा ख़ुद को,
हथेलियाँ लहूलुहान होती रहीं।
आईने के टुकड़े तो चुन लिए मैंने,
पर यादें कहाँ कभी रोती रहीं?
तुम चले गए,
पर जाते-जाते इतना कर गए,
मेरे हिस्से का हर मौसम
अपने साथ ले गए।
अब बहारें भी आती हैं
तो पतझड़-सी लगती हैं,
भीड़ से भरी महफ़िलें भी
वीरान शहर-सी लगती हैं।
मैंने कई बार
अपने कमरे के आईने बदले,
दीवारों के रंग बदले,
रास्ते बदले,
शहर बदले...
मगर हर नए आईने में
चेहरा मेरा नहीं,
अक्स तुम्हारा ही उभर आता है।
शायद प्रेम का अर्थ
मिल जाना नहीं होता...
शायद प्रेम का अर्थ
उम्रभर किसी को
अपने भीतर जीवित रखना होता है।
तुम्हारे जाने के बाद
मैंने हँसना भी सीखा,
लोगों से मिलना भी सीखा,
जीना भी सीखा...
पर सच कहूँ,
वो सब जीना नहीं था,
बस साँसों का हिसाब था।
आज भी जब कोई पूछता है,
"कैसे हो?"
मैं मुस्कुरा देता हूँ...
क्योंकि दर्द की भी
एक अजीब-सी तहज़ीब होती है,
वो हर किसी के सामने
अपना चेहरा नहीं खोलता।
दिल जो टूटा आईने की तरह,
हर टुकड़े में तुम नज़र आने लगे।
अब तो हालत ये है कि
ख़ुद से भी नज़रें मिलाऊँ,
तो तुम्हीं नज़र आने लगे।
काश...
प्रेम भी आईने जैसा होता,
टूटता तो बस एक बार...
पर प्रेम तो समुद्र है,
हर लहर के साथ
फिर से टूट जाता है।
और मैं...
आज भी उसी किनारे बैठा हूँ,
जहाँ तुमने आख़िरी बार
मेरा हाथ छोड़ा था...
और तब से
हर शाम, हर रात, हर सवेरा
बस एक ही पंक्ति दोहराता हूँ
दिल जो टूटा आईने की तरह,
हर टुकड़े में तुम नज़र आने लगे...
और मैं हर रोज़,
थोड़ा-थोड़ा बिखरने लगा...।
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