अंजान शहर में है
फिर भी पहचानते हे लोग।
मैं कम ही तालूक रखता हूँ लोगों से
फिर भी दोस्त मानते हे लोग।
मैं जिन्हे दुश्मन
उन्हें दोस्त मानते हे लोग।
सच्च जानते हुये भी
मुँह पर ही झूठ बोलते हे लोग।
जो राज नहीं खोलना था
उसे खोलकर ही राज बोलते हे लोग।
जो हर रोज होता है पर जाता नहीं
उसे आज बोलते हे लोग।
पहचान रखते हे हम सबकी
जिसे जानना होता है, उसे कम पहचानते हे लोग।
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