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बाबरा वो इंसाँ कहाँ है

                
                                                         
                            जिसे अपना कहें, ऐसा कोई इंसाँ कहाँ है,
                                                                 
                            
इस भीड़ में दिल को मिले ऐसा मकाँ कहाँ है।
हर शख़्स यहाँ अपनी ज़रूरत का रक़ीब है,
बिन मतलब जो साथ चले, वो कारवाँ कहाँ है।
चेहरों पे हँसी सबके, मगर आँखें हैं नम-सी,
इस शहर में अब दर्द का कोई बयाँ कहाँ है।
जो टूट के बिखरे हैं, उन्हें कौन सँभाले,
हर हाथ में मरहम का यहाँ हुनर कहाँ है।
हम ढूँढ़ते रहे जिसे रिश्तों की भीड़ में,
वो प्यार से पूछे कोई—“तू परेशान कहाँ है?”
कल तक जो हमारे थे, आज पूछते हैं हाल,
इससे बड़ा दुनिया में कोई इम्तिहाँ कहाँ है।
सच बोल दिया हमने तो तन्हा हैं राहों में,
सच के लिए दुनिया में कोई पासबाँ कहाँ है।
हमने तो निभाया था हर इक रिश्ता दिल से,
अब लोग ये पूछते हैं—इसमें फ़ायदा कहाँ है।
‘बाबरा’ जिसे रखता था दुआओं में हमेशा,
वो शख़्स तो मिल जाए, मगर पहले-सा कहाँ है।
-सुशील कुमार ‘बाबरा’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
55 मिनट पहले

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