*तीजन ऑ तानपुरा*
कला ने ललाट
क्या चूमा!
महाभारत सजीव हो
गया,
पंडवानी कला का
नया आहान हो गया।
लड़कपन में ही
वो नाना की कला
में खो गईं।
ज़माने ने लाख
समझाया
माँ ने भी घर छुड़ाया
पर वो तो पांडवानी
आसमाँ में उड़ उसी
की हो गईं।
रस्मों रिवाजों की
कारा तोड़
पुुरुष गायन शैली
कापालिक में समा
गईं।
सारा महाभारत
तीजन-तानपुरे
की तान में
भाव- भंगिमा,
नव रंग-रूप,
रस-गंध
ऑ सारस्वत स्वर ले
ओजस्वी आभामंडल
में समो गया।
देखते ही देखते
छत्तीसगढ़ की बेटी
भारत की कला ध्वजा हो गईं।
देश और विदेश में
उनकी कला अब
चंद्रकला हो गईं।
जीवन चल रहा था,
अपनी शान से
समय भी आया
अपनी चाल से।
ले गया काल आज
तीजन ऑ तानपुरे को
मौत की आन से।
पंडवानी कला भी
उदास है
कौन देगा परवाज़
उसे,
अपने अभिनय महान से,
अभिनय महान से।
-सूर्यकांत शर्मा
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