रिश्ते भी गए,,,,
रिश्ते भी गए,
नाते भी गए,
लगता है,
ऊपर वाले की
टकसाल में उन्हें
ढालने वाले
कामगार -कारीगर
भी गए।
पहले कभी रिश्ते
नातों की रफ़ूगरी
होती थी।
गिले-शिकवे- शिकायतों
को दूर करने वाले,
राफ्ता कायम
करने वाले!
अब तो लगता
है के वो
रफ़ूगरी -ए -जादूगर
भी गए।
ग्लोकल से ग्लोबल
के दौर में ,' सूर्य,'
भाषा की
लोकोक्तियाँ ऑ
मुहावरे भी गए।
रिश्ते नातों की
बात ही क्या
बरगद सी छाया
वाले बजुर्गों की
याद ही क्या?!
भाषा -संस्कृति
की बिसात ही
क्या?!
अब तो संस्कार
रौंपने वाले
फरिश्ते भी गए।
सियासत है
निज़ाम है,
पर इनकी
आलमी तासीर
से मेरे मुल्क के
सारे सहारे भी गए।
-सूर्यकांत शर्मा
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