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पेट में धधकता शमशान

                
                                                         
                            पेट में धधकता शमशान,,
                                                                 
                            

ये पेट भी क्या चीज है
सच में क्या अजीब है।
सुख- दुख,
हानि -लाभ
कुछ भी हो
यहां सब कुछ होम है
बस यहां पेट का
धधकता शमशान है।

गरीब हो अमीर हो
बूढ़ा हो या जवान
बस पेट एक सवाल है?!
फूलों की सेज हो
या कांटों का ताज
नहीं रहने देता
ये पेट कोई राज़।
आधी आबादी हो
या मर्दों की बात
सवाल सबका एक है
क्यों पेट में धधकता
श्मशान है।
स्वर्ग हो नर्क हो
या भूलोक या फिर
गोलोक
वहां पर भी पेट है
एक धधकता हुआ
शमशान।
भाव हों अभाव हों
क्रंदन हो रूदन हो
पर नहीं बंद होती
पेट के मसान की आग।
दमन हो कि शमन हो
तिस पर भी
पेट में धधकता है
एक सदैव शमशान।
जन्म हो मरण हो
या फिर कोई श्राद्ध
तर्पण स्नान
पर पेट में सतत
धधकता एक शमशान।
भक्ति हो भजन हो
या फिर कोई पावन
अवसर महान
पर नहीं छूटता
इस पापी पेट में
धधकता एक शमशान।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

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