नीति की रीति
लफ्फाजी का पुलिंदा
होती जा रही
समूची दुनिया
की
सारी की सारी
कूटनीति ।
यही अल्फ़ाज़ों
की बाज़ीगरी
बन रही अब
युद्धनीति।
लिपे पुते शब्दों की
हो रही राजनीति,
गोया के शैतानी इरादों
की हो रही
प्रतीति।
तू मुझ से
ताकतवर कैसे
मैं तुझ से कमतर कैसे!!
मैं तुझे सताऊंगा
ऐसे कि तू रो जायेगा,
वैसे ! का वैसे
हाँ वैसे।
इसी दंभ को ढो रही,
स्वयंभू महाशक्तियों
की दुराभिसंधि
बारूद की धांस से
युद्ध की धौंस से
खांस रही मानवता
फिर भी चल रही
कूटनीति ! विदेशनीति!
रणनीति!
राजनीति! की
द्यूत नीति।
-सूर्यकांत शर्मा
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