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मेरी तन्हाइयों में तू

                
                                                         
                            मेरी तन्हाइयों में तू,,,
                                                                 
                            

एक तन्हाई से आया
तू अपना वजूद
लेकर।
तेरे कौल पे
तेरे ऐतबार पे
तुझे वलीअल-अहद
बनाया मैने।
पर तेरी तन्हाइयों में तो
मेरा कोई ज़िक्र ही नहीं।

तू तो रहा ख्वाहिशों
की बंदिशों में
तेरे ख़्वाबों में तो
मेरा कोई अक्स
ही नहीं।
तू रहा
दुनिया -ए-मौसिकी में मस्त
तुझे तो मेरी कोई फ़िक्र ही नहीं।
तुझे भेजा था
फ़र्ज़ ए क़र्ज़ को पूरा करने
पर तेरे कामों में उनका
तो कोई अता पता ही नहीं।
तेरे वादे थे तेरे इरादे थे
इंसानियत की खिदमत के!?
पर तू तो कभी तन्हा हो
आया ही नहीं।
ना इबादत ही तुझ से हुई
ना मुहब्बत ही तुझ से हुई।

तू कभी संजीदा हुआ ही नहीं
तभी तो तभी तो
तू मेरी तन्हाइयों में
आया ही नहीं।
तेरी सारी की सारी
तमन्नाओं के दयार
खिलते रहे बार बार।
फिर तूने अपने को
फ़र्ज़ के लिए
चेताया ही नहीं।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा
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एक घंटा पहले

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