मौन की पहली सीढ़ी
ग्लोकल से ग्लोबल
होती पीढ़ी,
क्या समझेगी!
मौन की पहली सीढ़ी ?
जब आपाधापी का
हो बोलबाला
हो रहा हो हर कोई
मतवाला।
पश्चिमी संस्कृति की
तर्ज़ पर
अपनी ही बस अपनी
गर्ज़ पर।
हो रहा मानव से
मानव का अनाकर्षण
विकारों के बढ़ते जा रहे
आकर्षण पर आकर्षण।
जैसे के हो गया हो
परकाया प्रवेश
रावण बन गया हो
विभीषण ।
वाचालता का
बढ़ रहा प्रचलन
सीतब मौन की पहली
सीढ़ी का हो कैसे संचरण।
मन में कौंधते हो
विचार बस विचार
बस जिह्वा रहे मौन ।
क्या समझेगी नई
पौध,
तन के साथ
मन का मौन।
पढ़ लो चाहे कितने
शास्त्र और पुराण।
पर मौन की पहली
सीढ़ी को चाहिए
तन मन के संयम के
बाण।
यम- नियम, योग-आसन को बना
अपना अनुसंधान,
मौन की पहली सीढ़ी
का मिलगा तुमको
नया आहान।
-सूर्यकांत शर्मा
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