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*हस्त लिपि/लिखाई

                
                                                         
                            ख़त का ख़्याल,,
                                                                 
                            

ख़त का ख़्याल
बस यूँ ही आया।

उसका इंतज़ार
महबूब का इज़हार
न जाने क्यूं
आज जेहन में
बार बार आया।

वो चिट्ठी का आना
वो किसी का शर्म
से लाल हो,
उसे ले के दौड़ जाना।

गहरी साँसों और
धड़कते दिल से,
उसका पढ़ा जाना
बस यूँ ही
आज याद आया।
ख़त थे के
अल्फ़ाज़ -ए-आबशार ,
कुछ गुल थे
और कुछ महज़
खार।

ख़्वाब ऑ ख़्याल
रौशन होते थे
इल्म -ए -सीना में
और काग़ज़ पे
नमूदार होते थे
इल्म -ए -सफ़ीना में।

बस यूँ एक गुजरा
हुआ,
महकता सा दयार
याद आया
गोया के तेरा ख़्याल फिर
रुमानी हो आया।

ख़त का ज़िक्र
हुआ तो
दिल फिर से
रुमानी हो आया।

जैसे के तेरा आंचल,
फिर से सुरमई हो
आया
फिर से तेरा आंचल
तेरी ज़ुल्फ़ों से
तेरे शानों पे
सरक आया।

ख़त से ख़त* में
*हस्त लिपि/लिखाई
तेरा नाम मेरी
रौशनाई में
बस उसके इलहाम सा
रौशन हो आया।

बस उसके इलहाम सा
रौशन हो आया।
आपका मित्र
-सूर्यकांत शर्मा
 
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47 मिनट पहले

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