कहाँ खो गए,,,
प्रारब्ध से चले
तुम कितने भले।
स्वार्गिक से धुंध
से आए
साथ में निम्मज्जित
'उसे ' ले आए।
प्रारब्ध से पुरुषार्थ
में आए
पर ' उसे ' फिर भूल
आए ।
पंच पुतुल पर छाए
पंच विकारों के साए।
दुनियावी मैल में डूब
गए,
' वह ' फिर बोला
*कहाँ खो गए*।
ख़्वाबों -ख़यालों में
भी न आया,
आख़िर अब तुम कहाँ
खो गए।
हुस्न ओ इश्क की
गर्द में खोए ,
ज़र्द हुए तुम
इन में सोए।
उसकी चौखट पे
बजती रही नौबत
पर तुम रहे
गफ़लत में खोए।
ज़िन्दगी के दयार में,
बचपन में खेल
जवानी में नींद
और बुढ़ापे में
रहे रोए के रोए।
न इबादत
न मुहब्बत
आख़िर कह भी
दो,
तुम कहाँ खो गए।
-सूर्यकांत शर्मा
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