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बरगद मत बन

                
                                                         
                            बरगद मत बन
                                                                 
                            

कुछ भी बन
बस बरगद मत बन।
घास,नव -पल्लवित
वृक्षों ऑ लताओं
का हद से जियादा
धृतराष्ट्र सम स्वांग
संरक्षक मत बन।
मंच और माइक को
छोटे-मोटे वृक्ष ऑ
झाड़ियाँ समझ,
उन पर ययाति सा
परजीवी याचक
मत बन।
तभी तो! तभी तो,
कुछ भी बन
बस बरगद मत बन।

कर दे साबित असत्य
वनस्पति विज्ञान के
प्रायोगिक सिद्धांत
को!?

तब तक कर
दरकिनार अपनी
वय औ अनुभव
अर्जित शकुनी
समान दंभ को।

उगने दे वनस्पति
जगत की
वसंत पौध को,
करा दे जगत को
बरगद की समता
औ ममता के
अर्वाचीन बोध को।
नहीं तो सुन ले
कान खोल कर?!
होगा विवाद
नए नाद से ।
अनहद नाद से,
नए स्वर से
नव अंकुर से
सारी प्रकृति से
गूँजेगा ये यक्ष गान
कुछ भी बन बस
बरगद मत बन ,
बरगद मत बन,
हाँ! हाँ?! हा ! हा!
बरगद मत बन।
-सूर्यकांत शर्मा
 
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2 घंटे पहले

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