कौन मेरा होगा ?
सबके सुख-दुख में मैं साथ निभाता हूँ,
सबकी खातिर मैं दिन-रात दौड़ जाता हूँ,
अस्पताल हो या अदालत सभी जगह जाता हूँ,
घर-बाहर के सारे काम कर आता हूँ।
सबने अपना समझा, मैं सबका कहलाता हूँ,
अपना काम छोड़ के सबके काम आता हूँ,
सबके आंसू पोंछू, खुद मुस्कुराता हूँ,
सबके गम हर लूं, खुद गम छुपाता हूँ।
कभी-कभी थक के मैं चुप रह जाता हूँ,
फिर भी बुलावे पर वापस दौड़ जाता हूँ,
सब कराके भी खाली हाथ लौट आता हूँ,
और फिर खुद में ही खो सा जाता हूँ।
पर जब रात ढले, खुद से पूछ जाता हूँ,
एक सवाल पे आके मैं रुक जाता हूँ,
सोच-सोच के मन ही मन घबराता हूँ,
खुद से ही ये बात मैं कह पाता हूँ।
अगर कभी मुझपे भी कोई दुख आता है,
मेरी तबीयत बिगड़े, संकट आ जाता है,
तब मेरी इस दौड़ को कौन निभाता है,
मेरे लिये कौन अस्पताल दौड़ जाता है।
सोचता हूँ कोई तो होगा जो साथ निभा जाए,
ढूंढता हूँ भीड़ में जो अपना कहला जाए,
पर लाख टटोलूं कोई चेहरा नजर न आता है,
बस सन्नाटा ही मेरे सामने रह जाता है।
तो क्या यही सिला है सबका साथ निभाने का,
भीड़ में रह के भी तन्हा रह जाने का,
सबको अपना बना के खुद बेगाना कहलाने का,
या फिर यही दस्तूर है इस जमाने का ?
-सुरजीत क्रान्ति
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