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अंधेरा भी उसका वंदन करता है।

                
                                                         
                            डर से आगे
                                                                 
                            

डर से आगे जीत खड़ी है,
हिम्मत की राह वहीं खुलती है।
जो कदम कांपते-कांपते बढ़ जाए,
मंजिल उसी के नाम लिखती है।

डर से आगे सपना पलता है,
रातों की नींद वहीं जलती है।
गिर-गिर कर जो उठना सीख ले,
दुनिया उसी को मिसाल कहती है।

डर से आगे आवाज़ निकलती है,
खामोशी की दीवारें टूटती हैं।
जो सवालों से आंख मिला ले,
उसकी किस्मत खुद रूठती है।

डर से आगे रिश्ते पक्के होते हैं,
परख के बाद ही सोना कुंदन होता है।
जो तूफान में दिया जलाए,
अंधेरा भी उसका वंदन करता है।

इसलिए डर के आगे बढ़ जा,
क्योंकि जीत वहीं इंतज़ार करती है।
हौसला रख, मंजिल बोलेगी –
“तू आया तो कहानी बन गई।”
-सुरजीत क्रान्ति
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एक घंटा पहले

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