मैं आज़ाद हूँ — या सिर्फ़ आज़ादी का दर्शक?
मैं आज़ाद हूँ—
मुझे ऐसा लगा था,
जब पहली बार पढ़ी थी
मैंने ,संविधान की प्रस्तावना।
“हम भारत के लोग…”
तब मेरे अंदर एक विश्वास जगा था —
कि इस मिट्टी पर जन्म लेने वाला हर मनुष्य
सम्मान से जिएगा,
न्याय के लिए नहीं भटकेगा
अब दर-ब-दर
जी सकेगा
अपने अधिकारों के साथ
वो सिर उठाकर ।
मुझे लगा था—
अधिकार
अब ढाल बन जाएंगे
और संविधान बन जाएगा
स्वाभिमान की आवाज़
और तिरंगा
हर भारतीय के माथे का गौरव होगा।
फिर सुबह उस रोज
पंद्रह अगस्त।
मैं निकला घर से
आज़ादी का उत्सव देखने।
रास्ते में देखा—
कुछ लोग जाति की बातें कह कर
एक अधेड़ को पीट रहे थे।
वो कह रहे थे तुझे पता है
तेरी जात या हम बताएं तुझे तेरी औकात
गालियों में—
“नीच”, “जात”, “औक़ात”
जैसे शब्द
उसके शरीर से अधिक
उसकी आत्मा पर प्रहार कर रहे थे।
मैं ठिठका।
सोचा—
शायद संविधान की प्रस्तावना
इन गलियों से नहीं गुजरी होगी?
फिर आगे बढ़ा।
एक महिला को देखा—
कुछ वहशी दरिंदे
उसे अपना शिकार बनाना चाहते थे।
उनकी आँखों में वासना थी,
इरादों में हिंसा,
और भीतर
इंसानियत का अंतिम संस्कार हो चुका था।
अख़बार खोला—
तो पता चला—
कहीं बलात्कार,
कहीं छेड़छाड़,
कहीं बेटी की चीख,
कहीं न्याय के लिए वर्षों से भटकती माँ।
और ये सिर्फ़ अख़बारों की सुर्खियाँ नहीं—
संसद में पेश किए गए आँकड़े थे ।
मैंने तिरंगे की ओर देखा
और खुद से पूछा—
क्या आज़ाद हैं, मेरे देश की महिलाएँ,
या सिर्फ़ दर्शक हैं आज़ादी के समारोह की?
मैं आगे चला।
देखा ,बूढ़े माँ-बाप
एक घर के बाहर
खड़े थे।
लगता था—
बच्चे अब बड़े हो गए थे।
वही माँ
जिसने नौ महीने कोख में रखा था,
वही पिता
जिसने अपनी इच्छाएँ बेचकर
बच्चों के सपने खरीदे थे।
आज उन्हीं को
धक्के देकर
घर से निकाला जा रहा था।
उनकी आँखों में प्रश्न था—
“क्या जन्म देना ही
हमारा अपराध था?”
मैंने सिर झुका लिया।
सोचा—
जिस देश में
माँ-बाप अपने ही घर में
अनाथ हो जाएँ,
वहाँ विकास के आँकड़े
किस काम के?
फिर मैं लाल किले की ओर बढ़ा—
जहाँ राष्ट्र
आज़ादी का उत्सव मनाने वाला था।
रास्ते में
जंतर-मंतर पर पड़ी नजर
खड़े थे वहाँ कुछ युवा—
लेकर हाथों में तख्तियाँ,
भविष्य के सपने ,
उनके होठों पर थी
अधिकारों की आवाज I
वे नहीं माँग रहे थे कोई महल,
न ही कोई बड़ा साम्राज्य—
वे सिर्फ़ माँग रहे थे
अपने हिस्से का न्याय।
लेकिन सत्ता के गलियारों से
उनकी आवाज़ का उत्तर आया—
“तुम काकरोच हो।”
उन्हें इंसान नहीं समझा गया,
इसलिए शायद
उनके अधिकारों को भी
गंभीरता से नहीं लिया गया।
मैंने तिरंगे को देखा—
केसरिया
मुझसे पूछ रहा था,- त्याग
सफ़ेद
मुझसे पूछ रहा था,
सत्य
हरा
मुझसे समृद्धि पूछ रहा था,
और अशोक चक्र
मानो मुझसे पूछ रहा था—
“क्या तुम विकास की और जा रहे हो?”
मैंने बहुत देर तक
कोई उत्तर नहीं दिया।
क्योंकि सच यह था—
हाँ, मैं आज़ाद हूँ।
मैं आज़ाद हूँ
यह सब देखने के लिए।
मैं आज़ाद हूँ
अन्याय पर चुप रहने के लिए।
मैं आज़ाद हूँ
जाति के नाम पर बँटने के लिए।
मैं आज़ाद हूँ
स्त्री को अपमानित होते देख कर चुप रहने के लिए
मैं आज़ाद हूँ
बूढ़े माँ-बाप को अकेला छोड़ने के लिए।
मैं आज़ाद हूँ
युवाओं की आवाज़ को
सत्ता के शोर में दबते देखने के लिए।
लेकिन…
क्या मैं आज़ाद हूँ
इन सबके विरुद्ध खड़े होकर आवाज उठाने के लिए?
क्या मैं आज़ाद हूँ
सत्ता से सवाल पूछने के लिए?
क्या मैं आज़ाद हूँ
व्यवस्था बदलने का सपना देखने के लिए?
या मेरी आज़ादी
सिर्फ़ इतनी है
कि मैं हर वर्ष
पंद्रह अगस्त को
तिरंगा हाथ में लेकर
“भारत माता की जय” कह सकूँ?
मैं आज भी
अपने भीतर एक भारत खोज रहा हूँ—
जहाँ जाति
कभी किसी इंसान की
औक़ात तय न करे,
जहाँ बेटी
रास्ते पर निकलते समय
निर्भीक रहे,
जहाँ माँ-बाप
बुढ़ापे में
अपने ही बच्चों से न डरें,
जहाँ युवा
अपने अधिकार माँगने पर
देशद्रोही न कहलाएँ,
जहाँ किसान
अपनी फसल के साथ
अपनी नस्ल और
अपना भविष्य भी बचा सके,
जहाँ मज़दूर
अपने पसीने की कीमत पा सके,
जहाँ कानून
कमज़ोर के लिए भी
उतना ही मजबूत हो
जितना ताकतवर के लिए,
जहाँ सत्ता
जनता से ऊपर नहीं,
जनता के प्रति
जवाबदेह हो।
मैं ऐसे भारत की कल्पना करता हूँ—
जहाँ आज़ादी
सिर्फ़ इतिहास की तारीख न हो,
जहाँ संविधान
सिर्फ़ किताब न हो,
जहाँ तिरंगा
सिर्फ़ समारोह की सजावट न हो,
और जहाँ
“हम भारत के लोग”
सिर्फ़ प्रस्तावना के शब्द न रह जाएँ—
बल्कि हर भारतीय की
आत्मा में बस जाए ।
उस दिन
मैं सचमुच कहूँगा—
हाँ, मैं आज़ाद हूँ।
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