सचमुच ,
किराये की - -
काया है ,
और उसमें - -
अनमोल सांसों को - -
को खपत कर या,
बेचकर - -
किराया चुकता हूँ l
औकात तो,
बस मिट्टी जैसी - -
होती है,
या मिट्टी जितनी - -
होती है ,
फिर भी - -
इंसान बातें ,
महलों की - -
मीनारों से करता है,
ये कया भी - -
एक दिन ,
मिट जायेगी - -
फिर भी मनवा,
अपनी खूबसूरती पर - -
इतराता ही,
क्यों है?
ये भी,
सब को पता है कि ,
खुद के सहारे - -
शमशान तक भी,
कोई नहीं जा पाओगे - -
इसलिए,
इस ज़माने में भी - -
दोस्त बनाया करो l
-सुरेश कुमार झा 'अल्हर'
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