आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रोटी में उलझी जिंदगी

                
                                                         
                            गरीबी आने के बाद ,
                                                                 
                            
या यों कहे तो - -
गरीबी में,
कभी - कभी - -
रिश्ता भी ,
टूट जाता है - -
वो जो,
खास होता है - -
और ,
इसके विपरीत ,
जब पैसा रहे पास - -
बन जाते हैं,
हजारों यार - -
ना रहे पैसा पास,
यार संग भी - -
ना डोले l

यदि ,
रोज याद - -
नहीं कर पाऊँ ,
इस ज़माने में - -
तो भूल से,
खुदगर्ज ना - -
समझ लेना ,
दरअसल - -
इस छोटी सी,
जिंदगी में - -
परेशानियाँ भी,
बहुत है l

ऐसा नहीं कि,
मेरे हमदर्द या - -
दोस्त नहीं है,
मेरे बहुत - -
अच्छे दोस्त भी है ,
इस ज़माने में भी - -
लेकिन ,
मैं किसी को - -
भूला नहीं हूँ,
सच कहे तो - -
ये जिंदगी ही,
उलझी पड़ी है - -
दो वक़्त की,
रोटी कमाने में l
-सुरेश कुमार झा अल्हर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर