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स्वार्थ आने, लगता है

                
                                                         
                            किसी ने सच ही ,
                                                                 
                            
कहा है कि - -
रिश्ते की ,
बुनियाद की नींव - -
प्रेम और निस्वार्थ,
भाव पर टिके - -
रहते हैं ,
और - -
जीवनपर्यन्त ,
या यों कहे तो - -
अंतिम सांस तक,
साथ निभाते हैं - -
लाइफ मेंबर या,
या जीवन के अभिन्न - -
सदस्य के रूप में,
साथ निभाते हैं l

इस प्रकार ,
रिश्तों के - -
बनाने वाले,
बड़े नहीं होते हैं - -
अपितु ,
निभाने वाले - -
जरूर बड़े होते हैं l

इसी क्रम में ,
दरारें बड़ी नहीं होती - -
अपितु,
उसके भरने वाले - -
जरूर बड़े होते हैं ,
छोटी - छोटी बातें भी - -
किसी न किसी प्रकार से ,
रिश्तों को प्रभावित - -
जरूर करती है,
यह निस्वार्थ भाव - -
आपसी प्रेम के,
आधार पर - -
टिका रहता है ,
जैसे ही रिश्तों में - -
स्वार्थ आने,
लगता है - -
तो उसे टूटने में,
देर नहीं लगता है - -
वहीं प्रेम,
और - -
निस्वार्थ भाव,
आने पर - -
जीवन पर्यन्त,
रहता है l
-सुरेश कुमार झा 'अल्हर'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
33 minutes ago

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