सच में
ये जिंदगी तो,
केवल - -
दो दिन का ही,
तो है - -
क्यों न ?
इसको ,
सुकून या - -
सहजता से ,
जिया जाय - -
यह भी ,
कटु सत्य है - -
चाहे कितना भी ,
हाथ -पैर मारकर - -
धन - दौलत ,
एकठ्ठा कर लें - -
लकिन,
खाली हाथ आये थे - -
और ,
हाथ पसारे जायेंगे l
इसी क्रम में ,
चाहे महल के - -
रहने वाले हों,
या झोपड़ी - -
और कुटिया का,
अंत सभी का - -
एक जैसा ,
होता है - -
उन्हें भी ,
अंतिम निवास में - -
दो गज जमीन या,
(साढ़े तीन हाथ का )
मुठ्ठी भर राख ही - -
नसीब होता है ,
अभिप्राय - -
ऊंच - नीच ,
और - -
जाति -पाती का,
भेद - भाव - -
शमशान के ,
दरवाजे के - -
बाहर ही ,
खत्म हो जाता है l
हकीकत में ,
इंसान की - -
असली कीमत ,
उसके जाने के,- -
बाद होता है,
उसके पीछे - -
छोड़े गये प्रेम ,
और - -
उनके यादों से - -
की जाती है ,
कारण - -
सच में ,
ये जिंदगी - -
दो दिन की,
ही तो होती है - -
इसलिए ,
घमंड छोड़कर - -
केवल प्यार ,
बाँटता चल - -
और,
नर सेवा - -
या नारायण,
सेवा का - -
हिस्सा बनता चल l
-सुरेश कुमार झा 'अल्हर
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