चुप-चुप सी सांसों ने
कब ज़िंदगी की गिनती शुरू की
मुझे मालूम नहीं
मैं डूबा रहा जिंदगी की
धूप छांव के लेखा-जोखा में
और पल था कि खिसकता चला गया
मैं आज खुश हूं कि लोग आते हैं
मिलते हैं और चले जाते हैं
पर इस मिलने बिछड़ने का
अंत कब होगा मैं खुद
इन्तजार नहीं करता पर
इन्तजार उन सांसों का है
जो कभी आकर वापस नहीं लौटेंगी क्योंकि_
सच्चाई जिंदगी की
सांसों के अंतिम विदाई में हीं है
सुरेन्द्र देव सहाय
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