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महबूब

                
                                                         
                            मोहब्बत में ग़ज़ल क्या, तुम्हे आफ़ताब लिख सकते है
                                                                 
                            
नशेमन तेरे वस्ल में, तुम्हे गुलाब लिख सकते है

हाय ये हया तेरी सनी, दिल में दरार कर देती है
इस तरह दीदार ना कराओ, ये बेकार कर देती है

कई रोज डर के कोई आस्मा में झाँकने नहीं आया
मेरे महबूब की आंखें, चाँद को तार-तार कर देती है

वाबस्ता है हमे, की इक रोज तो मौत आनी है
मगर वो हूर हफ्ते में सात दिन बीमार कर देती है


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4 वर्ष पहले

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