हाँ ! मैं स्वयं 'गणतंत्र दिवस' बोल रहा हूँ !
आपके सामने, अपनी व्यथा खोल रहा हूँ।
अपने बचपन में , मैं बहुत प्रसन्न था
मेरा और भारतीयों का, अटूट संबंध था ।।
इस देश को भयंकर रोग ने आ घेरा
हुआ ऑपरेशन लगा एक चीरा ।
हाय! भारत का एक अंग काट डाला
उसे पाकिस्तान नाम दे डाला ।
जाति धर्म के नाम पर हुए दंगों से
देश में था छाया कहर ।
इंदिरा और राजीव की जघन्य हत्याओं से
मेरा दिल था गया दहल ।।
मैंने सोचा था! कि भारत
प्रेम सौहार्द का स्वर्ग बन जाएगा ।
पर मुझे क्या पता था ?
कि यहाँ जातिवाद भड़काया जाएगा।।
खैर छोड़िए ! वह सब थम गया
लेकिन एक हिंसक दौर, भारत में जम गया ।
आतंकियों से लड़कर ,जवान शहीद होते रहे
लेकिन हमारे नेता, महलों में छिपे रहे ।।
प्रकृति ने भी मेरे जन्मदाता पर, अच्छा कहर था ढाया
उड़ीसा, गुजरात को भूकंप ने हिलाया।
सुनामी से उसने ,दक्षिण वासियों को रुलाया ।
आज के नेता, बड़े-बड़े कांड कर रहे हैं
लेकिन कानून के रक्षक, उन्हें दंडित नहीं कर रहे हैं।
मैं कहता हूँ ! देशवासियों के लिए ,कानून बनाओ एक ।
जिसमें न्याय के रक्षकों का , दिल भी हो नेक ।।
'भारत के संविधान' में , हिंदी है मातृभाषा
लेकिन आज अंग्रेजी ही है ! बच्चे - बच्चे की भाषा।
अगर मेरा उत्सव, तुम्हें है मनाना !
तो कृपा करके ! मेरा वास्तविक स्वरूप अपनाना ।।
अब मैं अपनी कथा समाप्त करता हूँ।
पर तुमसे यह विनती करता हूँ ।
कि मेरे उत्सव पर अधिक खर्च न करके
तुम मेरे वास्तविक स्वरूप को पहचानो।
अगर तुम में है देश प्रेम, तो मेरा कहा मानो !
तो मेरा कहा मानो ।
- सुनीति केशरवानी 'नीति'
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