चिर-परिचित निरभ्र दिन को
रात के काले
भुजदंडों ने आलिंगनबद्ध कर लिया है
सुप्त मेघाच्छादित नभ के मुख
गाड़ियों के प्रकाश से चुंधिया रहे हैं,
हम जीवन से इतर सूक्ष्म पलायन के बाद
रात के अंधकार में घर लौट रहे हैं
वापस लौटते हुए,
आसपास की परिचित दुनिया अपरिचित सी दिखाई दे रही है
लौटते हुए,
मन का स्फुरण अपने चरम पर है
धूसरित कांच सी नभ की पारदर्शिता में
अनेकों आकृतियां जन्म ले रही हैं
सड़क के किनारे खड़े हुए लैंप पोस्ट
विचार- निमग्न दार्शनिक से दिखाई दे रहे हैं
दौड़ती हुई कारें जीवन का स्पंदन और परिवर्तनशीलता के इश्तिहार
सड़क पर गिराते हुए सरपट दौड़ रही हैं ,
जाते हुए जो दृश्य रम्य थे
लौटते हुए उनका आंतरिक सौंदर्य
प्रत्यक्ष महसूस हो रहा है
यात्रा ने बाहर नहीं भीतर से हमारी आत्मा को कोमल बना दिया है
नदी,पहाड़,कछार ,पेड़ ,हवा सुंदर नहीं
उन्हें नवीनता देने हेतु हमारी दृष्टि सुंदर हो गयी है,
दरअसल,
यात्रा ने हमारे भीतर की जड़ता को
निष्क्रिय कर दिया है
यात्राओं का हासिल यही है कि जाते हुए
हम जो भी अपने भीतर साथ लेकर जाते हैं
वापस लौटते हुए
वह लेशमात्र ही हमारे भीतर बचा रहता है
यात्राएं हमें भरती नहीं हैं
हमें हमारी धारणाओं , पूर्वाग्रहों से मुक्त करती हैं,
हम मुक्त,नये वापस होकर घर लौट रहे हैं
यात्रायें कहती हैं कि
घर से दूर जाना ही यात्रायें नहीं
दूर से वापस आकर स्वयं के भीतर नवीन दृष्टि उत्पन्न करना ही यात्राऐं हैं
यात्रायें हमें वस्तुनिष्ठ होना सिखाती हैं
दूर जाकर महज़ सुंदर दृश्यों को देखना
ही यात्रा नहीं है
यात्राएं घर वापस लौटते हुए
हमारे मूल की पैठ में घर बनाकर बैठी हुई जड़ मान्यताओं का खंडित होना भी है
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