सभी कुछ सरकारें ही नहीं करेंगी,
दायित्व सारा भला कैसे लेंगी?
प्यारा देश, हम सबका है,
जिम्मेदारी बराबर सबकी होगी।
जिन अधिकारों की अपेक्षा हमसे,
भाषणों में क्यों केवल कह दें।
सभी को सच समझना होगा,
कर्तव्यों का बोध करना होगा।
समय की मांग है—देखें इसकी,
कानून आवश्यक बनाना होगा।
अधिकारों पर हम शोर मचाते,
जब-तब जंतर-मंतर पर जुट जाते।
आए जब बात कभी कर्तव्यों की,
अधिकांशतः हम सब चुप हो जाते।
अधिकार मिले—यह सबकी चाहत,
कर्तव्य निभाना—क्यों नहीं आवश्यक?
इस दोहरी नीति से बाहर आकर,
राष्ट्रहित की राह अपनाएँ।
तय मानकों और नियमों को
जीवन में भी अमल में लाएँ।
श्रेष्ठ सूझीजन को समझना होगा,
आने वाली पीढ़ी को गढ़ना होगा।
नियम तभी सम्मानित होंगे,
जब पालन उनका हम खुद करेंगे।
इस बदलाव की शुरुआत पहली
घर अपने और स्वयं से होगी।
देशहित में जब हो आह्वान,
तब बढ़कर आगे साथ निभाना है।
पर ध्यान रहे—हिंसा नहीं,
सहयोग की नीति अपनाना है।
संवाद रहें, सम्मान रहें,
लोकतंत्र की मर्यादा का मान रहे।
लोकतंत्र में बात कहने का
सबको खुला अधिकार मिला।
पर स्वतंत्रता के साथ संयम हो,
ऐसा भी आह्वान मिला।
असहमति पर संवाद करें,
देशहित को सर्वोपरि रखें।
जब अधिकार और कर्तव्य साथ चलेंगे,
तब सशक्त और समृद्ध बनेगा भारत।
आइए, अधिकारों का सम्मान करें,
कर्तव्यों का निर्वहन करें,
रख लोकतंत्र की मर्यादा को,
राष्ट्रहित में योगदान करें।
— सुनील झा (सकरी)
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