जी करता,
माँ की गोद में सिर रखकर,
एक नींद सुकून की पाऊँ,
पल भर के लिए मैं,
सारे दर्द मैं भूल जाऊँ।
जी करता,
पिताजी के चरणों में बैठकर
जिम्मेदारियों का बोझ उतार पाऊँ,
पल भर को ही सही,
इन जिम्मेदारियों से खुद को छुड़ा पाऊँ।
जी करता,
भाई के कंधों पर बैठकर
फिर सारा गाँव घूम आऊँ,
पल भर में ही जैसे
पूरे संसार की सैर कर आऊँ।
जी करता,
बहन के साथ बैठकर
फिर वही पुरानी बातें कर पाऊँ,
पल भर में ही सही,
दुनिया की हर बात उसे सुना पाऊँ।
जी करता,
गाँव के बरामदे की छत पर चढ़कर
दिन भर पतंग उड़ाऊँ,
पल भर में जैसे
पूरे आसमान को छू आऊँ।
जी करता,
आज फिर गाँव के तालाब में
नहाने को चला जाऊँ,
पल भर में ही जैसे
पूरे समुद्र की सैर कर आऊँ।
जी करता,
मैं फिर अपने गाँव लौट जाऊँ,
पर पेट की खातिर
इस शहर से नाता कैसे तोड़ पाऊँ।
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