राह हमारी औरों से दूजी है
कांटे की हर चुभन मेरी पूंजी है ।
मंजिल हर वक्त चुनौती देगी
प्यास हिमालय की चोटी चढ़ लेगी ।
संकल्प अगर जिद कर लेगा
पर्वत से कंकड़ लड़ लेगा ।
अपनी शर्तो पे जीवन जीने वाले
कितना मुश्किल होगा ।
कागज की नाव
दरिया पार उतरने वाले
कितना मुश्किल होगा ।
लौह भस्म होता है
सबने खूब सुना है
कठिन बहुत है तो क्या
हमने तो भी कठिन चुना है ।
सपने सच होते हैं सच करना पड़ता है
पहले अपने अन्तर्मन से लड़ना पड़ता है
आंखे जिनकी लक्ष्य दूर का देखा करती हैं
अश्रु निकलते रहते हैं, आनंद बटोरा करती हैं
जिनके पैरों में छाले हैं
वो लोग बहुत पहले से चलने वाले हैं
तुमने जितनी बार पीठ में पत्थर मारे
सच कहता हूं ,हर कोशिश में, पत्थर मेरे बने सहारे ।
समय याद रखना हम वापस आएंगे
षड़यंत्रो की आग पार कर जाएंगे ।
सृजन हमारा निश्चित एक दिन फल जाएगा
लाक्षाग्रह का अहंकार जल जाएगा ।
सब शर्ते स्वीकार नहीं होंगी
दुर्योधन,कृष्ण खड़े हैं,हार नही होगी ।
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