चुप्पी"
मृत्यु के पास
जाना नहीं पड़ता,
वह खुद-ब-खुद
चली आती है।
उस समय
शायद हम
सपनों की रंगीनियों में खोए हों,
या
ज़िंदगी को
पूरी शिद्दत से गले लगा रहे हों।
वह आती है
बिना किसी आहट के,
और
छीन ले जाती है
ज़िंदगी को
ज़िंदगी के ही हाथों से।
ज़िंदगी
बहुत शोर करती है शायद,
इसीलिए
हर बार हार जाती है,
और मौत
चुप्पी ओढ़े
चुपचाप जीत जाती है।
-सुजाता चक्रवर्ती
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