आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सपनों की रंगीनियों में खोए हों

                
                                                         
                            चुप्पी"
                                                                 
                            
मृत्यु के पास
जाना नहीं पड़ता,
वह खुद-ब-खुद
चली आती है।
उस समय
शायद हम
सपनों की रंगीनियों में खोए हों,
या
ज़िंदगी को
पूरी शिद्दत से गले लगा रहे हों।
वह आती है
बिना किसी आहट के,
और
छीन ले जाती है
ज़िंदगी को
ज़िंदगी के ही हाथों से।
ज़िंदगी
बहुत शोर करती है शायद,
इसीलिए
हर बार हार जाती है,
और मौत
चुप्पी ओढ़े
चुपचाप जीत जाती है।
-सुजाता चक्रवर्ती
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
39 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर