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आजकल सारे गवैया हैं।

                
                                                         
                            ताल का टूटा पेंदा है
                                                                 
                            
लय की बिखरी लड़ियां हैं
हिलती सुर की नैया है
आजकल सारे गवैया हैं।

फेसबुक तो बस बाथरूम है
जो भी आता, गाता है
इधर-उधर की वाह-वाह से आत्ममुग्ध हो जाता है
नमूनों ने सुन इनको, ली इनकी बलैयॉं हैं
आजकल सारे गवैया हैं।

संगीत यूॅं तो कहते हैं आत्मा की वाणी है
अंतस् के अंतरतम के इंद्रधनुष की बानी है
सरसिज पर रिमझिम बरसती दिव्य अमृत बूॅंदों की स्पृहा
कल-कल कर बहती सरिता में साधक बने खेवैया हैं
पर अब तो सारे गवैया हैं।

पहले गायक सुर-ताल में तपते, रचते, बसते थे
स्निग्ध सुधा की थाती पाते, तब जा कर बरसते थे
मानस में अवगाहन करते, फिर झरने से बहते थे
सुनते मानो दिगंत तक चलती एक पुरवैया है
पर अब तो सारे गवैया हैं,
भैया, अब तो सारे ही गवैया हैं।
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10 महीने पहले

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